Sunday, February 12, 2012

व्यवस्था का बेतुकापन, बेहूदगी और आज के विचारक


आपने आस-पास, या टीवी या रेडियो में किसी न किसी आदर्शवादी, धार्मिक-सामाजिक संस्था या व्यक्ति को देखने और सुनने का मौका हम सभी को मिला होगा, जो प्रवचन और दर्शन ( ऐसा उन्हें -बोलने और सुनने वाले दोनो को- लगता है...) की "उच्च कोटि" की बाते करते हुए पाए जाते है। लेकिन इनके प्रवचनों मे परिस्थितियों का कारण समझने, उन्हें बदलने की कोई झलक कभी नहीं मिलती। इसी सम्बन्ध में लगभग 150 साल पहले लिखी गईं यह लाइने हमारे देश को लोगों के लिए आज भी महात्वपूर्ण हैं,
"परिस्थितियां समाज में एक आवश्यकता को जन्म देती हैं। इस आवश्यकता को सब स्वीकार करते हैं, इस आवश्यकता की आम स्वीकृति के बाद यह जरूरी है कि वस्तुस्थिति में परिवर्तिन हो...।....चिन्तन मनन और वाद-विवाद के बाद क्रियाशीलता की श्रीगणेश होना चाहिये।... वर्षों से हमारे समाज ने क्या किया है? अब तक - कुछ नहीं।  उसने मनन-अध्ययन किया, विकसित हुआ, प्रवचनो को सुना, अपने विश्वासों के लिए संघर्ष के दौर में लगे आघातों पर सहानुभूति प्रकट की, कार्यक्षेत्र मे उतरने की तैयारी की, किन्तु किया कुछ नहीं! ढेर की ढेर सुन्दर भावनाओं-कल्पनाओं से लोगों के हृदय मस्तिष्क पट गए, समाज की वर्तमान व्यवस्था के बेतुकेपन और बेहूदगी का इतना पर्दाफाश किया गया कि पर्दाफाश करने के लिए कुछ रह ही नहीं गया। प्रतिवर्ष विशिष्ट, अपने-आप को 'चारों ओर की वास्तविकता से ऊंचा समझनेवाले', लोगों की संख्या बढ़ने लगी। ऐसा लगता था कि सीघ्र ही सब लोग वास्तविकता से ऊँचे उठ जायेंगे।...हमें ऐसे लोगों की आवश्यकता नहीं है।... हमें ऐसे लोगो की आवश्यकता है जो स्वयं हमें वास्तविकता को ऊंचा उठाना सिखायें, ताकि हम उसे उन संगत मानकों के स्तर पर ला सकें जिन्हें सब मानते और स्वीकार करते हैं।" -Written by literary critique and philosopher Dobrolyubov (February 5, 1836 – November 29, 1861).

इसी विचार को रूसी क्रांतिकारी लेनिन के शब्दों में थोड़ा और स्पष्ट रूप से कहें तो,
"जब 'निचले वर्ग' पुराने तरीको को मानने से इनकार कर देते हैं, और 'ऊपरी-वर्ग' पुराने तरीके बनाए रखने में असफल हो जाते हैं -सिर्फ तभी क्रांतियों की जीत होती है।" . . . "क्रांतियां मेहनतकश और शोषित जनता द्वारा राजनीतिक संघर्ष में भाग लेने वालों की संख्या का दस गुना, यहां तक कि सौ गुना तीव्रता से विकसित होने का परिणाम होती हैं।" -लेनिन
["When the "lower classes" do not want the old way and when "upper classes" cannot carry on in the old way -only then revolutions triumph."  "Revolutions is a rapid, tenfold even hundredfold increase in the number of the toiling and oppresses masses who are capable of waging the political struggle" -Lenin]

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